छत्तीसगढ़ में जनजातीय समाज के सतत् विकास में लघु वनोपजों की भूमिका एक आर्थिक विश्लेषण
बीजू राम1*, सुनील कुमार कुमेटी2, बी.एल. सोनेकर3
1शोधार्थी, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
2सह-प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
3प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: beejuramnetam94@gmail.com
ABSTRACT:
छत्तीसगढ़ भारत का एक प्रमुख वनसमृद्ध राज्य है, जहाँ बड़ी संख्या में जनजातीय समुदाय निवास करते हैं और उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार लघु वनोपज हैं। राज्य का लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है, जिसके कारण यहाँ लघु वनोपज का व्यापक संग्रहण एवं उपयोग होता है। सतत् विकास की अवधारणा आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन पर आधारित है। क्योंकि लघु वनोपज संग्रहण में पेड़ों की कटाई नहीं होती और वन को बिना क्षति पहुँचाए आय सृजित की जाती है। इसप्रकार लघु वनोपज पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आजीविका को भी संरक्षण करता है। छत्तीसगढ़ में लघु वनोपज केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के सतत् विकास का आधार है। यह आय सुरक्षा, सामाजिक सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण एवं सामुदायिक सहभागिता का समन्वित मॉडल है। लघु वनोपज जनजातीय परिवारों की आजिविका का महत्वपूर्ण स्त्रोत के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राज्य में लघु वनोपज विपणन की त्रिस्तरीय संरचना विद्यमान है जैसे - राज्य लघु वनोपज विपणन संघ मर्यादित (1), जिला लघु वनोपज सहकारी संघ(31) और प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति(902)। साथ ही प्रधानमंत्री वन-धन योजना के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ में कुल 139 केन्द्रों में लगभग 17,424 महिला स्व-सहायता समूह लाभान्वित हो रहे हैं। प्रस्तुत अध्ययन से स्पष्ट होता है कि लघु वनोपज जनजातीय परिवारों के लिए नकद आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। कई परिवारों की कुल वार्षिक आय में लघु वनोपज का योगदान 40 प्रतिशत तक पाया गया है। लघु वनोपज संग्रहण एवं विपणन में नीतिगत सुधार, प्रशिक्षण एवं बाजार विस्तार के माध्यम से इस क्षेत्र को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, जिससे जनजातीय समुदायों की आत्मनिर्भरता एवं जीवन स्तर में दीर्घकालिक सुधार हो सके। प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों आंकड़ों आधारित वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन है।
KEYWORDS: जनजातीय समुदाय, सतत् विकास, लघु वनोपज, विपणन व्यवस्था।
INTRODUCTION:
छत्तीसगढ़ भारत का एक प्रमुख वनसमृद्ध राज्य है, जहाँ लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है। कुल जनसंख्या का 30.62 प्रतिशत अनुसूचित जनजाती निवास करती है। राज्य के बस्तर संभाग, सरगुजा संभाग और राज्य के सीमावर्ती जिलों में जनजातीय आबादी का घनत्व अधिक है। इन समुदायों का जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था वनों पर आधारित रही है। विशेष रूप से लघु वनोपज (Minor Forest Produce – MFP), जिन्हें गैर-काष्ठ वन उत्पाद (NTFP) भी कहा जाता है, जनजातीय समाज की आजीविका का मुख्य आधार हैं।
लघु वनोपजों में तेंदूपत्ता, महुआ, हर्रा, बहेरा, आँवला, इमली, शहद, लाख, गोंद, चिरौंजी, जड़ी-बूटियाँ तथा बांस जैसे उत्पाद शामिल हैं। ये उत्पाद न केवल स्थानीय उपभोग के लिए उपयोगी हैं, बल्कि बाजार में बिक्री के माध्यम से आय अर्जन का महत्वपूर्ण साधन भी हैं। वर्षा आधारित कृषि और सीमित रोजगार अवसरों के कारण जनजातीय परिवारों के लिए लघु वनोपज आय का पूरक और कई बार मुख्य स्रोत बन जाती हैं। विशेष रूप से तेंदूपत्ता संग्रहण और महुआ विक्रय से हजारों परिवारों को मौसमी रोजगार और नकद आय प्राप्त होती है।
छत्तीसगढ़ में लघु वनोपजों के संगठित संग्रहण और विपणन के लिए छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ मर्यादित महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संस्था न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से उत्पादकों को उचित मूल्य दिलाने का प्रयास करती है। राष्ट्रीय स्तर पर TRIFED जनजातीय उत्पादों को व्यापक बाजार से जोड़ता है। इसके अतिरिक्त Forest Rights Act ने जनजातीय समुदायों को वन संसाधनों पर अधिकार प्रदान कर आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
सतत् विकास की दृष्टि से लघु वनोपजों का महत्व अत्यंत व्यापक है। यह केवल आय का स्रोत नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी माध्यम है। जनजातीय समुदाय पारंपरिक ज्ञान के आधार पर वनों का उपयोग संतुलित रूप में करते हैं, जिससे जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बना रहता है। लघु वनोपज आधारित गतिविधियाँ वनों की कटाई को कम करती हैं और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं।
अतः छत्तीसगढ़ में जनजातीय समाज के सतत् विकास के संदर्भ में लघु वनोपजों की भूमिका बहुआयामी है। यह आर्थिक सुदृढ़ता, सामाजिक सशक्तिकरण और पर्यावरणीय संतुलनकृतीनों को एक साथ आगे बढ़ाती है। प्रस्तुत शोध का उद्देश्य इन्हीं पहलुओं का आर्थिक विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करना है कि लघु वनोपजें जनजातीय समाज के समग्र और सतत् विकास में किस प्रकार महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
शोध साहित्य:-
जैन डॉ. सुनिता, (2016), ने ‘‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति की आर्थिक स्थिति की समीक्षात्मक अध्ययन (दमोह जिले के विशेष सन्दर्भ में)‘‘ बताया है कि दमोह जिले के संदर्भ में अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिलते हैं, परंतु अभी भी यह राष्ट्रीय औसत की तुलना में कमजोर बनी हुई है। सरकारी योजनाओं और सामाजिक पहलों से सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन स्थायी और व्यापक आर्थिक विकास के लिए शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार, कृषि आधुनिकीकरण और बाजार संपर्क को मजबूत करना आवश्यक है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दमोह जिले में SC एवं ST समुदायों के समग्र आर्थिक विकास के लिए नीतिगत सुधार, जागरूकता विस्तार और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के ठोस प्रयास अत्यंत आवश्यक है।
सेनी डॉ. रविश कुमार एवं अग्रवाल श्रीमती शिखा, (2018), ने ‘‘बस्तर संभाग में वनोपज उत्पादन एवं बाजार मांग का विश्लेषणात्मक अध्ययन‘‘ , में बताया है कि बस्तर संभाग में वनोपज उत्पादन जनजातीय समाज की आर्थिक रीढ़ है और बाजार में इसकी मांग निरंतर बनी हुई है। हालांकि उत्पादन और विपणन के बीच संरचनात्मक कमियाँ हैं, फिर भी उचित नीति समर्थन, वैज्ञानिक प्रबंधन, मूल्य संवर्धन और बाजार विस्तार के माध्यम से वनोपज क्षेत्र को अधिक सशक्त बनाया जा सकता है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन तंत्र को संगठित एवं आधुनिक बनाया जाए, तो बस्तर संभाग में वनोपज क्षेत्र न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करेगा, बल्कि सतत् और समावेशी विकास का प्रभावी माध्यम भी सिद्ध होगा।
अग्रवाल डॉ. किशोर कुमार, राजेश्वरी, (2019), ने ‘‘छत्तीसगढ़ आदिवासियों के आजीविका के साधन वर्तमान परिदृश्य में‘‘ बताया है कि आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए प्रर्याप्त संसाधन का अध्ययन किया है। जहाँ पारंपरिक साधनों के साथ आधुनिक आर्थिक अवसर भी जुड़ रहे हैं। हालांकि सुधार के संकेत स्पष्ट हैं, फिर भी स्थायी और समावेशी विकास के लिए शिक्षा, कौशल उन्नयन, मूल्य संवर्धन, बाजार विस्तार और संसाधन संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। शोध से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्तमान परिदृश्य में आदिवासी आजीविका को सुदृढ़ बनाने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक आर्थिक रणनीतियों के समन्वय की आवश्यकता है, जिससे सतत् और समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।
खुटे डॉ. डी. एन. (2020), ने ‘‘पर्यावरण संरक्षण और बस्तर का धन सल्फी‘‘ , का अध्ययन किया है। बस्तर का धन ‘सल्फी’ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित उपयोग सतत् विकास की दिशा में प्रभावी मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अतः सल्फी के संरक्षण और संवर्धन से न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि जनजातीय समाज की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि भी सुनिश्चित होगी।
Rai Santosh Kumar and Agrawal Dr. R.P, (2016), इन्होनें अपने अध्ययन में ‘‘छत्तीसगढ़ राज्य में आदिमजाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के आर्थिक विकास हेतु राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाओं‘‘ का अध्ययन किया है। इन योजनाओं ने आय सृजन, रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है। हालाँकि योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए पारदर्शिता, जागरूकता, सरल प्रक्रियाएँ और नियमित निगरानी आवश्यक है। यदि इन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो ये योजनाएँ राज्य के वंचित वर्गों के सतत् और समग्र आर्थिक विकास में और अधिक प्रभावी सिद्ध होंगी।
शोध का महत्व:-
इस विषय का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लघु वनोपज केवल आय का स्रोत ही नहीं, बल्कि सतत् विकास का आधार भी हैं। इनके वैज्ञानिक संग्रहण और उचित विपणन से पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक उन्नति संभव है। राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ मर्यादित के माध्यम से समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था ने जनजातीय समाज को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है। अतः यह अध्ययन जनजातीय समाज की आय वृद्धि, रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण तथा पर्यावरणीय संतुलन के संदर्भ में लघु वनोपजों के वास्तविक योगदान का मूल्यांकन करने में सहायक सिद्ध होता है और नीति निर्माण के लिए उपयोगी दिशा प्रदान करता है।
अध्ययन का उद्देश्य:-
इसके अंतर्गत निम्नलिखित विशिष्ट उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं:-
1. लघु वनोपज और जनजातीय आजीविका का अध्ययन।
2. संग्रहित परिवारों की आर्थिक विश्लेषण और मूल्य श्रृंखला का अध्ययन।
3. लघु वनोपज संग्रहण से सतत् विकास और पर्यावरणीय दृष्टिकोण का अध्ययन।
4. महिला सशक्तिकरण और सामाजिक प्रभाव का अध्ययन।
5. लघु वनोपज संग्रहण एवं विपणन की चुनौतियाँ और संभावनाएँ का पहचान करना।
शोध प्रविधि:-
प्रस्तुत शोध अध्ययन में आंकड़ों का संकलन प्राथमिक एवं द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। प्राथमिक आंकड़ों का संकलन प्रत्यक्ष साक्षात्कार, अनुसूची एवं समूह चर्चा से किया गया है। और द्वितीयक प्राप्त आंकड़ों का संकलन सरकारी रिपोर्ट, जनगणना आँकड़ों एवं शोध पत्रों से किया गया है। प्राप्त आंकड़ों को वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।
लघु वनोपज और जनजातीय आजीविका:-
जनजातीय क्षेत्रों में कृषि प्रायः वर्षा आधारित और सीमित संसाधनों पर निर्भर होती है। इस कारण वर्ष भर स्थिर आय उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में लघु वनोपज पूरक आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनती हैं। विशेषकर तेंदूपत्ता संग्रहण के मौसम में हजारों परिवारों को रोजगार प्राप्त होता है। महुआ फूलों का संग्रहण और विक्रय भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकद आय का प्रवाह सुनिश्चित करता है।
सारणी क्र. 1 जनजातीय परिवारों की वार्षिक आय में लघु वनोपज का योगदान
|
क्र. |
विकासखण्ड |
वार्षिक आय में लघु वनोपज का योगदान |
|||
|
20 से 40 प्रतिशत |
40 से 60 प्रतिशत |
60 से अधिक प्रतिशत |
योग |
||
|
1 |
कोण्डागांव |
28 |
40 |
10 |
78 |
|
2 |
माकड़ी |
35 |
28 |
15 |
78 |
|
3 |
फरसगांव |
19 |
45 |
14 |
78 |
|
4 |
केशकाल |
34 |
35 |
9 |
78 |
|
5 |
बड़ेराजपुर |
41 |
20 |
17 |
78 |
|
कुल |
157 |
168 |
65 |
390 |
|
|
प्रतिशत |
40.26 |
43.08 |
16.67 |
100 |
स्रोत - व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
रेखाचित्र क्र. 1 जनजातीय परिवारों की वार्षिक आय में लघु वनोपज का योगदान
स्रोत - व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
सारणी क्र. 1 में जनजातीय परिवारों की वार्षिक आय में लघु वनोपज का योगदान को प्रदर्शित किया गया है। कुल 390 में से 40.26 प्रतिशत (157) उत्तरदाता परिवार को 20 से 30 प्रतिशत आय लघु वनोपज से प्राप्त होता है, 43.08 प्रतिशत (168) उत्तरदाता परिवार को 40 से 60 प्रतिशत आय लघु वनोपज से प्राप्त होता है और 16.67 प्रतिशत (65) उत्तरदाता परिवार को 60 प्रतिशत से अधिक आय लघु वनोपज से प्राप्त होता है, अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय परिवारों की वार्षिक आय का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा लघु वनोपजों से प्राप्त होता है। यह आय परिवारों की खाद्य सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक दायित्वों की पूर्ति में सहायक होती है। इस प्रकार लघु वनोपज गरीबी उन्मूलन और जीवन स्तर सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आर्थिक विश्लेषण और मूल्य श्रृंखला:-
आर्थिक दृष्टि से लघु वनोपज को आय, रोजगार और स्थानीय बाजार की सक्रियता के संदर्भ में देखा जा सकता है। लघु वनोपजों का संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन एक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण करता है।
सारणी क्र.2 जनजातीय परिवारों में लघु वनोपज से रोजगार की उपलब्धता
|
क्र. |
विकासखण्ड |
लघु वनोपज संग्रहण से रोजगार की उपलब्धता |
|||
|
अति अल्पकाल (1 माह तक) |
अल्पकाल (2 से 3 माह तक) |
दीर्घकाल (3 माह से अधिक) |
योग |
||
|
1 |
कोण्डागांव |
14 |
52 |
12 |
78 |
|
17.95 |
66.67 |
15.38 |
100 |
||
|
2 |
माकड़ी |
10 |
50 |
18 |
78 |
|
12.82 |
64.1 |
23.08 |
100 |
||
|
3 |
फरसगांव |
12 |
39 |
27 |
78 |
|
15.38 |
50 |
34.62 |
100 |
||
|
4 |
केशकाल |
16 |
55 |
7 |
78 |
|
20.51 |
70.51 |
8.97 |
100 |
||
|
5 |
बड़ेराजपुर |
22 |
52 |
4 |
78 |
|
28.21 |
66.67 |
5.13 |
100 |
||
|
कुल |
74 |
248 |
68 |
390 |
|
|
योग |
18.97 |
63.59 |
17.44 |
100 |
|
स्रोत - व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
तालिका क्र. 2 में जनजातीय परिवारों में लघु वनोपज से रोजगार की उपलब्धता का विवरण को प्रदर्शित किया गया है। कुल 390 में से 18.97 प्रतिशत (74) उत्तरदाता परिवार को लघु वनोपज से अतिअल्पकाल (1 माह तक) के लिए रोजगार प्राप्त होता है, 63.59 प्रतिशत (248) उत्तरदाता परिवारों को अल्पकाल (2 से 3 माह तक ) के लिए रोजगार प्राप्त होता है और 17.44 प्रतिशत (68) उत्तरदाता परिवारों को दीर्घ काल (3 माह से अधिक) रोजगार प्राप्त होती है। प्राप्ति आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक 63.59 प्रशित (248) उत्तरदाताओं लघु वनोपज संग्रहण से अल्पकाल के लिए रोजगार प्राप्त होता है।
रेखाचित्र क्र. 2 जनजातीय परिवारों में लघु वनोपज से रोजगार की उपलब्धता
स्रोत - व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
छत्तीसगढ़ में लघु वनोपजों के संगठित प्रबंधन हेतु छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ मर्यादित महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संस्था न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद सुनिश्चित करती है, जिससे उत्पादकों को उचित मूल्य प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर पर TRIFED जनजातीय उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराता है।
फिर भी मूल्य श्रृंखला में कुछ समस्याएँ विद्यमान हैं, जैसे भंडारण की कमी, परिवहन अवसंरचना का अभाव, बाजार की जानकारी का अभाव तथा मध्यस्थों की अधिक भूमिका। इन चुनौतियों के कारण उत्पादकों को पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता। यदि स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की व्यवस्था विकसित की जाए, तो आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
सतत् विकास और पर्यावरणीय दृष्टिकोण:-
सतत् विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक न्याय भी है। जनजातीय समुदाय परंपरागत ज्ञान के आधार पर वनों का उपयोग संतुलित रूप से करते हैं। फल, फूल और बीजों का संग्रहण वृक्षों को काटे बिना किया जाता है, जिससे वन की जैव विविधता बनी रहती है।
सारणी क्र. 3 में हर्बल उत्पाद का उत्पादन की प्रगति का विवरण (मूल्य लाख में)
|
क्र. |
वित्तीय वर्ष |
हर्बल उत्पाद का उत्पादन |
|
|
उत्पादों की संख्या |
मूल्य |
||
|
1 |
2019-20 |
103 |
146 |
|
2 |
2020-21 |
121 |
744 |
|
3 |
2021-22 |
137 |
802 |
|
4 |
2022-23 |
140 |
689 |
|
5 |
2023-24 |
145 |
345 |
|
योग |
145 |
2726 |
छत्तीसगढ़ शासन प्रशासकीय प्रतिवेदन वर्ष 2023-24
रेखाचित्र क्र. 3 में हर्बल उत्पाद का उत्पादन की प्रगति का विवरण
छत्तीसगढ़ शासन प्रशासकीय प्रतिवेदन वर्ष 2023-24
वन संसाधनों पर समुदाय के अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए केंद्र सरकार ने थ्वतमेज त्पहीजे ।बज लागू किया, जिसके माध्यम से जनजातीय समुदायों को लघु वनोपजों पर स्वामित्व और उपयोग का अधिकार मिला। इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और संसाधनों के संरक्षण में उनकी भागीदारी बढ़ी।
लघु वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था वनों की कटाई को कम करती है और हरित विकास की अवधारणा को प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार यह पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संतुलन में भी योगदान देती है।
महिला सशक्तिकरण और सामाजिक प्रभाव:-
लघु वनोपज संग्रहण में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी होती है। वे महुआ, तेंदूपत्ता, शहद और अन्य उत्पादों के संग्रहण एवं प्राथमिक प्रसंस्करण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इससे महिलाओं की आय में वृद्धि होती है और परिवार के निर्णयों में उनकी भागीदारी सुदृढ़ होती है। इसके अतिरिक्त लघु वनोपज आधारित स्व-सहायता समूह और वन धन समितियाँ महिलाओं को सामूहिक उद्यमिता का अवसर प्रदान करती हैं। इससे सामाजिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।
चुनौतियाँ और संभावनाएँ:-
यद्यपि लघु वनोपजों में अपार संभावनाएँ हैं, फिर भी कुछ चुनौतियाँ सामने आती हैं
1. बाजार मूल्य में अस्थिरता
2. वैज्ञानिक संग्रहण तकनीकों का अभाव
3. प्रसंस्करण इकाइयों की कमी
4. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
इन समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक है कि प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, वित्तीय समर्थन और बाजार संपर्क को मजबूत किया जाए। डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-मार्केटिंग के माध्यम से जनजातीय उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई जा सकती है।
निष्कर्ष:-
छत्तीसगढ़ में जनजातीय समाज के सतत् विकास में लघु वनोपजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये उत्पाद आय सृजन, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के सभी पहलुओं में योगदान करते हैं। यदि इनका वैज्ञानिक प्रबंधन, मूल्य संवर्धन और प्रभावी विपणन सुनिश्चित किया जाए, तो लघु वनोपजें जनजातीय समाज की आर्थिक समृद्धि और सतत् विकास का मजबूत आधार बन सकती हैं। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में लघु वनोपजें केवल वन उत्पाद नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की आर्थिक रीढ़ हैं, जो सतत् विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
सुझाव:-
1. जनजातीय संग्राहकों को लघु वनोपज का उचित मूल्य मिले, इसके लिए सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को और मजबूत करना चाहिए।
2. लघु वनोपजों के विपणन के लिए सहकारी समितियों और वन विभाग की संस्थाओं को मजबूत किया जाए ताकि बिचौलियों की भूमिका कम हो सके।
3. केवल कच्चे रूप में बेचने के बजाय प्रसंस्करण कर उत्पादों का मूल्य बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग स्थापित किया जाना चाहिए।
4. जनजातीय समुदाय को लघु वनोपज के वैज्ञानिक संग्रहण, संरक्षण और विपणन के बारे में प्रशिक्षण दिया जाए।
5. लघु वनोपज के सुरक्षित भंडारण और उचित परिवहन की व्यवस्था विकसित की जाए ताकि उत्पाद खराब न हों और बाजार तक आसानी से पहुंच सकें।
6. लघु वनोपज संग्रहण और प्रसंस्करण में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए।
7. वनों का संरक्षण करते हुए लघु वनोपज का संतुलित उपयोग किया जाए ताकि प्राकृतिक संसाधन भविष्य के लिए सुरक्षित रह सकें।
8. राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे वन धन विकास केंद्र का सही तरीके से क्रियान्वयन किया जाए।
सन्दर्भ सूची:-
1. जैन डॉ. सुनिता, (2016)1, ‘‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति की आर्थिक स्थिति की समीक्षात्मक अध्ययन (दमोह जिले के विशेष सन्दर्भ में)‘‘, Int. J. Reviews and Research in Social Sci. 4(4): October- December 2016, ISSN 2347-5145(Print), ISSN 2454-2687 (Online).
2. Rai Santosh Kumar & Agrawal Dr. R.P, (2016)2, ‘‘छत्तीसगढ़ राज्य में आदिमजाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के आर्थिक विकास हेतु राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाएं Indian Journal of Applied Research, June 2016, Volume : 6, Issue : 6, ISSN - 2249-555X, IF : 3.919, IC Value : 74.50.
3. सेनी डॉ. रविश कुमार एवं अग्रवाल श्रीमती शिखा, (2018)3, ‘‘बस्तर संभाग में वनोपज उत्पादन एवं बाजार मांग का विश्लेषणात्मक अध्ययन‘, International Journal of Creative Research Thoughts (IJCRT), April 2018, Volume 6, Issue 2, ISSN: 2320-2882.
4. अग्रवाल डॉ किशोर कुमार, राजेश्वरी, (2019)4, ‘‘छत्तीसगढ़ आदिवासियों के आजीविका के साधन वर्तमान परिदृश्य में‘, International Journal of Reviews and Research in Social Sciences. April- June, 2019, Vol. 07, Issue-02, ISSN 2347-5145 (Print) 2454-2687 (Online).
5. खुटे डॉ. डी. एन. (2020)5, ‘‘पर्यावरण संरक्षण और बस्तर का धन सल्फी‘Journal of Ravishankar University, October 2020. Part-A, Vol-26.
6. छत्तीसगढ़ शासन प्रशासनिक प्रतिवेदन वर्ष 2023-24
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Received on 05.01.2026 Revised on 13.02.2026 Accepted on 10.03.2026 Published on 20.03.2026 Available online from March 23, 2026 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):77-83. DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00014 ©A and V Publications All right reserved
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